Saturday, January 10, 2009

दास्ताने ओंनसाईट

कहाँ से शुरुआत करें कुछ समझ नही आ रहा 
शुरूआत अच्छी हो ऐसा किसी कवि ने कहा 

तो भाई पिछली अच्छी याद तो हमें अपने कॉलेज की ही है.
फिर क्यों न कॉलेज से ही अपनी आपबीती प्रारम्भ करें 

बात हमारे कॉलेज की पहले साल की है 
कैंटीन में लगायी गप्पों और सामने वाले मिलन सिनेमा हॉल की है. 

पदाई लिखाई के मामले में तो हम स्कूल के ज़माने से ही बड़े वाले थे 
पर कॉलेज में तो मियां पास होने के ही लाले थे 

किसी तरह से हमने अपने पहले साल को निकाला 
और दूसरे साल में मेहनत करने का फ़ैसला भी साथ में कर डाला

उन्ही दिनों हमारा मिलना एक दूर के आईटी प्रोफेशनल भाई से हुआ 
जिनका कुछ दिनों पहले ही विदेश से आना हुआ 

भई वाह!  वोह तो विदेश की तारीफों के पुल बांधते ही चले गए 
और हम भी उनके दिखाए सपनो में बहते चले गए 

ठान लिया हमने भी कॉलेज के बाद हम भी आईटी कंपनी में काम करेंगे 
और कहीं विदेश में जा कर अपना नाम करेंगे 

ऊपर वाले ने भी हमारा खूब साथ दिया 
और एक अच्छी नौकरी को सामने ला कर खड़ा किया 

राशिफल में विदेश जाना तय पाया 
तो हमने भई तुंरत पासपोर्ट बनवाया 

काम के भूत में प्रोजेक्ट तो क्या कंपनी भी बदलती चली गई 
ओंनसाईट तो क्या ! घर में क्या चल रहा है यह याददाश्त भी चली गई 

खैर, बाहार जाने का दिन तो आना ही था 
आख़िर अमेरिका ने भी तो हमें आजमाना था 

सोलह घंटे की उड़ान के बाद हम वैसे ही परेशान थे 
उससे कहीं ज़्यादा एअरपोर्ट पर लगी लाइन से हैरान थे 

पूछने पर पता चला की यहाँ भी एक इंटरव्यू है 
हमने सोचा की अब हमसे क्या पूछोगे ? हम तो पहले यहाँ न्यू है 

किसी तरह हम अपने होटल आ गए  
तो यहाँ के हालात देख कर हम चक्कर खा गए 

यह होटल है या किराए का मकान है ?
न रूम में पानी है और ना ही सर्विस का कोई इंतज़ाम है 

यहाँ सारे काम ख़ुद ही करने होते है 
जैसे हम इंसान नही कोई खोते है 

अगले दिन से ही हमको ऑफिस जाना था 
और अपने लिए एक घर भी तलाशना था 

हमारी तलाश रंग लायी 
और दो दिन बाद ही एक अच्छे फ्लैट की डील सामने आई 

यहाँ हर चीज़ उलटी है की.मी नही मील है, सामान तोला जाता पाउंड में है    
हम भी अब अच्छे से समझ चुके थे की, हम आसमान में नही ग्राउंड में है 

यहाँ के तो टीवी चैनल भी बेगाने है 
न कोई ब्रेकिंग न्यूज़ और न ही कोई हिन्दी गाने है 

वैसे भी टीवी के लिए वक्त नही है 
हमको खाना बानाने और बर्तन साफ़ करने से फुर्सत नही है 

घर आने पर अभी भी मुँह से निकल जाता है 
"मम्मी कुछ खाने को है "

इससे पहले की मामला इमोशनल हो जाए 
क्यों न इन दो आखरी पंक्तियों से कविता गोल की जाए 

वैसे तो हमको जेम्स बोंड की फ़िल्म का काफ़ी क्रेज़ है 
पर अब लगता है की दुनिया की सबसे अच्छी फ़िल्म स्वदेस है 

आपका
धीरज श्रीवास्तव

1 comment:

  1. बहुत खूब भाई ...
    अंदाजे बयाँ पसंद आया खासकर कविता समेटने का तरीका आखिरी दो लाइन में ....

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