कहने को तो सब रिश्तों के नाम होते है
पर हक़ीक़त में कुछ तो सिर्फ नाम के होते है..
घर.. घर जब कहलाता है जब बिना कुछ कहे बात होती है..
वो घर कहां... जहां हर बात पर बात होती है..
खामोशी का ज़हर जब किसी पौधे को सुखाता है..
अग़र परिवार होता है तो उसे ज़रूर बचाता है..
सबको पता है उंगलिया बराबर नही होती है..
पर ये बात रोज़ बतायी जाए तो छोटी को कहाँ बर्दाश्त होती है..
मैं बड़ा वो छोटा.. वो पहले आये...
देखना इस आपा धापी में कहीं कोई हाथ न छूट जाए
जिस घर में खुल कर प्यार का इज़हार होता है..
दरअसल में वही घर एक 'परिवार' होता है...
आपका
धीरज