Wednesday, June 16, 2010

मैं मेरी पत्नी और अमेरिका


इसको दिल्ली के सरकारी स्कूल का जादू कहिये या फिर हमारी पेर्सोनालिटी का करिश्मा
client का हमारे बिना हो गया था मुश्किल जीना

इसलिए उसने हमको फिर से अमेरिका बुलवाया था
सडकें , गाड़ियाँ , मौसम सबकुछ वैसा ही था फिर भी जनाब कुछ न कुछ बदला पाया था

हम अभी इसी उधेड़ बुन में थे की क्या बदला है
हमने पाया की यह तो कम्बखत हमारी प्राणेश्वरी का गला है

उनके गले में 48 घंटों में क ख ग की जगह A B C था
और हो भी क्यों न आखिर यहाँ पर दिल्ली के 48 डिग्री की जगह 24 घंटों का AC था

पहली पंक्ति में सरकारी स्कूल का ज़िक्र हमने इसलिए किया था
क्योंकी भाई आज भी हमारा हाथ अंग्रेजी में तंग था

अपनी कॉन्वेंट educated पत्नी को हमने किसी तरह से हिंदी की आदत डलवाई थी
पर लगता है US की टिकेट ने सारी महेनत की वाट लगाई थी

मेरे जैसा काहिल जो दिल्ली में सिवाय ऐश के कुछ नहीं करता था
यहाँ पर सब्जी , दूध, अंडे, ब्रैड, आटा, दाल, चावल.. जाने क्या क्या नहीं खरीदता था

भैया खरीदने से ज्यादा हमको उन्हें पड़ने में डर लगता है
भगवान् जाने हमने कौनसी अंग्रेजी पड़ी है यहाँ भिन्डी 'Lady finger' नहीं ओकरा है

बैगन 'Brinjal' नहीं Eggplant है
न जाने हमारी भागवान को कैसे ये सारा ज्ञान है

और तो और हमारे लड़के के भी तेवर देखते बनते हैं
जनाब अब वोह भाईसाहब अंग्रेजी में रोते हैं

पूछने पर पता चला की एक दिन वोह दूध दूध चिल्ला रहा था
पर हमारी पत्नी को दूध से अधिक मिल्क शब्द भा रहा था

वोह नन्ही सी जान बेचारा क्या करता
वैसे भी मिल्क बोलने ही उसके लिए फिट था

इंडिया में तो हमने अपनी उनको हमेशा सूट या साडी में देखा था
खुदा जाने यहाँ कैसे सूटकेस में जींस और स्कर्ट का कोटा था

अब तो आलम ये है की हम मंदिर नहीं temple जाते हैं
सेब को अगर apple बोले तभी खा पाते हैं

यह सब तो ठीक है पर भागवान पर एक न एक दिन तो हमको वापिस जाना है
बेटे को फिर से दूध पीना और मुझे सेब खाना है

आख़िरकार हर पासपोर्ट में वीसा एक न एक दिन ख़त्म होता है
क्योंकि अपने ही पानी में मिल जाना बर्फ का मुकद्दर होता है !!

आपका
धीरज