इसको दिल्ली के सरकारी स्कूल का जादू कहिये या फिर हमारी पेर्सोनालिटी का करिश्मा
इसलिए उसने हमको फिर से अमेरिका बुलवाया था
सडकें , गाड़ियाँ , मौसम सबकुछ वैसा ही था फिर भी जनाब कुछ न कुछ बदला पाया था
हम अभी इसी उधेड़ बुन में थे की क्या बदला है
हमने पाया की यह तो कम्बखत हमारी प्राणेश्वरी का गला है
पहली पंक्ति में सरकारी स्कूल का ज़िक्र हमने इसलिए किया था
क्योंकी भाई आज भी हमारा हाथ अंग्रेजी में तंग था
क्योंकी भाई आज भी हमारा हाथ अंग्रेजी में तंग था
अपनी कॉन्वेंट educated पत्नी को हमने किसी तरह से हिंदी की आदत डलवाई थी
पर लगता है US की टिकेट ने सारी महेनत की वाट लगाई थी
मेरे जैसा काहिल जो दिल्ली में सिवाय ऐश के कुछ नहीं करता था
यहाँ पर सब्जी , दूध, अंडे, ब्रैड, आटा, दाल, चावल.. जाने क्या क्या नहीं खरीदता था
पर लगता है US की टिकेट ने सारी महेनत की वाट लगाई थी
मेरे जैसा काहिल जो दिल्ली में सिवाय ऐश के कुछ नहीं करता था
यहाँ पर सब्जी , दूध, अंडे, ब्रैड, आटा, दाल, चावल.. जाने क्या क्या नहीं खरीदता था
भैया खरीदने से ज्यादा हमको उन्हें पड़ने में डर लगता है
भगवान् जाने हमने कौनसी अंग्रेजी पड़ी है यहाँ भिन्डी 'Lady finger' नहीं ओकरा है
बैगन 'Brinjal' नहीं Eggplant है
न जाने हमारी भागवान को कैसे ये सारा ज्ञान है
और तो और हमारे लड़के के भी तेवर देखते बनते हैं
जनाब अब वोह भाईसाहब अंग्रेजी में रोते हैं
पूछने पर पता चला की एक दिन वोह दूध दूध चिल्ला रहा था
पर हमारी पत्नी को दूध से अधिक मिल्क शब्द भा रहा था
वोह नन्ही सी जान बेचारा क्या करता
वैसे भी मिल्क बोलने ही उसके लिए फिट था
इंडिया में तो हमने अपनी उनको हमेशा सूट या साडी में देखा था
खुदा जाने यहाँ कैसे सूटकेस में जींस और स्कर्ट का कोटा था
न जाने हमारी भागवान को कैसे ये सारा ज्ञान है
और तो और हमारे लड़के के भी तेवर देखते बनते हैं
जनाब अब वोह भाईसाहब अंग्रेजी में रोते हैं
पूछने पर पता चला की एक दिन वोह दूध दूध चिल्ला रहा था
पर हमारी पत्नी को दूध से अधिक मिल्क शब्द भा रहा था
वोह नन्ही सी जान बेचारा क्या करता
वैसे भी मिल्क बोलने ही उसके लिए फिट था
इंडिया में तो हमने अपनी उनको हमेशा सूट या साडी में देखा था
खुदा जाने यहाँ कैसे सूटकेस में जींस और स्कर्ट का कोटा था
अब तो आलम ये है की हम मंदिर नहीं temple जाते हैं
सेब को अगर apple बोले तभी खा पाते हैं
यह सब तो ठीक है पर भागवान पर एक न एक दिन तो हमको वापिस जाना है
बेटे को फिर से दूध पीना और मुझे सेब खाना है
आख़िरकार हर पासपोर्ट में वीसा एक न एक दिन ख़त्म होता है
क्योंकि अपने ही पानी में मिल जाना बर्फ का मुकद्दर होता है !!
आपका
धीरज
आपका
धीरज
haha, bahut khoob likha bandhu! serious baatein bahut ho gayi, please keep such lighter stuff coming too!
ReplyDeleteSahi hai janaab :)
ReplyDeletegreat hai sirjii.
ReplyDeletekeep writing
अमेरिका में किस शहर की खाक छान रहे हो? खरबूजे पर प्रकाश नहीं डाला आपने? आप भी तो कुर्ता-पाजामा की जगह चड्डा लेकर गए होंगे? बढिया लिखा है आपने आनन्द आ गया, क्योंकि हम ही इन दिनों यहाँ की ही खाक छान रहे हैं। लेकिन संतोष यह है कि जल्दी ही वापसी का टिकट है।
ReplyDeleteBahot sahi likha hai yaar....teri haalat iss waqt meri in linon main tu dekh sakta hai....Likha hai hindi main lekin english alphabets ka USE kiya hai....
ReplyDeleteKeep in touch.... not just with your blogs but also with INDIA as you are....
Good work.....
kya baat hai bhaiya !!!!!!!!!!!
ReplyDeletelage raho lage raho
@धन्यवाद अजित जी हम लोग फिलहाल अटलांटा में ख़ाक छान और अभी काफी दिन है बर्फ के पिघलने में :-) उम्मीद करता हूँ आपसे संवाद बना रहेगा
ReplyDeletekya bat hai bhai.. Hume pata nahi tha humare beech mai ek KAVI bhi hai.. Nice one
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